वेस्ट बैंक में इजराइल के ‘एकतरफा’ फैसलों और इसकी अवैध उपस्थिति को बढ़ाने के उद्देश्य से उठाए गए कदमों की निंदा की गई है। इसकी निंदा करने वालों में भारत भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन के स्थायी पर्यवेक्षक मिशन ने 100 देशों और संगठनों की ओर से एक बयान जारी किया गया।

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नई दिल्ली : भारत उन 100 से अधिक देशों और वैश्विक संगठनों में शुमार हो गया है जिन्होंने वेस्ट बैंक में इजराइल के 'एकतरफा' फैसलों और इसकी अवैध उपस्थिति को बढ़ाने के उद्देश्य से उठाए गए कदमों की निंदा की है। बुधवार को संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन के स्थायी पर्यवेक्षक मिशन ने 100 देशों और संगठनों की ओर से एक बयान जारी कर ''इजराइल के एकतरफा कदमों की निंदा की और कब्जे का विरोध किया।''

बयान के अनुसार, हस्ताक्षरकर्ताओं ने वेस्ट बैंक में इजराइल की अवैध उपस्थिति को बढ़ाने के उद्देश्य से इजराइल के एकतरफा फैसलों और कदमों की कड़ी निंदा की। बयान में कहा गया है, ''ऐसे फैसले अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इजराइल के दायित्वों के विपरीत हैं और इन्हें तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। हम इस संबंध में किसी भी प्रकार के कब्जे के प्रति अपने कड़े विरोध को रेखांकित करते हैं।''

 

पहले 85 देशों ने की थी कार्रवाई की निंदा

इससे पहले, 17 फरवरी को जारी बयान के माध्यम से 85 देशों ने कब्जे वाले वेस्ट बैंक में इजराइल के एकतरफा कदमों और नीतियों की निंदा की थी। भारत उन शुरुआती देशों में शामिल नहीं था जिन्होंने संयुक्त रूप से बयान जारी किया था। बाद में भारत ने भी उस संयुक्त बयान का समर्थन किया जिसका 100 से अधिक देशों और संगठनों ने समर्थन किया था।


बयान में कहा गया है कि देशों ने 1967 से कब्जे वाले फलस्तीनी क्षेत्र, जिसमें पूर्वी यरुशलम भी शामिल है, की जनसांख्यिकीय संरचना, चरित्र और स्थिति को बदलने के उद्देश्य से उठाए गए सभी उपायों को अस्वीकार करने की बात दोहराई है। इसमें कहा गया है, ''ऐसे उपाय अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हैं, क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए चल रहे प्रयासों को कमजोर करते हैं, व्यापक योजना के विपरीत हैं और संघर्ष को समाप्त करने वाले शांति समझौते तक पहुंचने की संभावना को खतरे में डालते हैं।''

 

फलस्तीन को मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश

देशों ने दोहराया कि प्रासंगिक संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों, मैड्रिड संदर्भ शर्तों (जिसमें शांति के बदले भूमि का सिद्धांत शामिल है) और अरब शांति पहल पर आधारित एक न्यायपूर्ण और स्थायी शांति जो इजराइली कब्जे को समाप्त करे और दो-राज्य समाधान को लागू करे, क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने का एकमात्र मार्ग है। भारत ने हमेशा एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फलस्तीन राज्य का समर्थन किया है। भारत 1988 में फलस्तीनी राज्य को मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश था।